सोने से पहले ब्लाग में आपका स्वागत है।
मैं एक शिक्षक हूँ । बच्चों से मेरा नित्य प्रति संवाद बना रहता है। आज बच्चो में प्रतिभा बहुत है, पर संस्कारों की न्यूनता भी है। आज बच्चों के बड़े होने पर माता-पिता उनसे उन संस्कारों की उम्मीद करते हैं जो उन्होंने अपने बच्चे को कभी नहीं दिया। याद करें हम अपना बचपन -
सोने से पहले माँ से एक कहानी सुनना अनिवार्य था। माँ की कहानियां अधिकतर राम-कृष्ण, श्रवण कुमार, सत्य हरिश्चंद्र, राजा- रानी, परियों , योद्धाओं , देवी एवं देवताओं की हुआ करती थीं। कहानियों के पात्र मन की गहराई तक उतर जाते थे। मन करता था हम भी वैसे ही बन जाएँ। सोते तो सपने में कहानी के पात्र दिखाई देते। आज जब हम बच्चो के साथ बैठते हैं तो संभवतः ऐसी बातें नहीं हैं । हम बच्चों के साथ टीवी पर कोई कार्यक्रम देख रहे होते हैं । जिस समय बच्चे टीवी कार्यक्रम देखते हैं , उनकी कल्पनाशीलता पर विराम लग जाता है क्यों की कान जो सुन रहा है , आँखे उसे देख रही हैं । बच्चों में एकाग्रता का स्तर ऊंचा होता है, इस अवस्था में बच्चे के लिए सोचना या कल्पना करना कठिन हो जाता है । चिंतित या विचलित मन एकाग्रता में कठिनाई का अनुभव करता है ।बड़े एक कार्य करते हुए दूसरे के बारे में सोच सकते हैं ।
बच्चो से बातें करते हुए हम उनसे आत्मीय सम्बन्ध स्थापित करते हैं। ऐसी बातें मन की गहराई तक पहुँच कर मष्तिस्क में दीर्घकाल के लिए अंकित हो जाती हैं।
एक अच्छा समय था जब संयुक्त परिवार हुआ करता था। उस संयुक्तता में घर के अतिरिक्त मोहल्ले के बड़े बुजुर्ग भी सम्मिलित थे। संसकारों के साथ सामाजिकता का ज्ञान बच्चों को आँख खोलते ही होने लगता था।
जाड़े की शाम या सुबह अलाव के पास हम घर के ही नहीं पास- पड़ोस के बच्चे भी एक साथ बैठ कर आग तापते थे। तब भी घर के या पास पड़ोस का कोई बुजुर्ग जीवन के लिए उपयोगी बहुत सी बातें बता दिया करते थे। कई बार विद्यालय में गुरुजनों द्वारा ऐसे प्रश्न पूछ लिए जाते थे जो पुस्तकों में नहीं अपितु बुजुर्गों द्वारा प्रदत्त ज्ञान से सम्बंधित होते थे। रामायण - महाभारत से सम्बंधित कोई भी प्रश्न अनुत्तरित नहीं था। आज हम केवल सोच रहे हैं की समाज को क्या हो गया है? समाज कोई एकल वस्तु नहीं है। यह सृष्टि के समस्त जड़- चेतन के अदृश्य संबंधो का ताना - बना है।
हम अपने कर्तव्यों से मुह मोड़ कर अच्छे समाज के बारे में नहीं सोच सकते। जब हमारे पास अपने बच्चों से बात करने का समय नहीं होता, हम उनके भीतर कल्पना का भी एक आदर्श नही विक्सित कर सकते तो यह हमारी अपनी ही पराजय है। फिर हमें समाज या युग को दोष देने का अधिकार नहीं है। इसी लिए यह जरूरी है की हम सोने से पहले बच्चों से बात करें। बच्चे की अवस्था के अनुसार सोने से पहले कहानी अवश्य सुनाएँ या सुनें ।
आप की प्रतिक्रियाओं का स्वागत है।
आपका अपना -
रमाशंकर उपाध्याय